राजीव रंजन प्रसाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजीव रंजन प्रसाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

घने जंगल में खूबसूरत फूल: चंद्रू [एक संस्मरण, बस्तर के जंगलों से] – राजीव रंजन प्रसाद


बात कोई तेरह -चौदह वर्ष पुरानी है। उस रात जब केवल मेरे कमरे में आया तो उसके चेहरे में एक चमक थी। पत्रकारों को किसी नई कहानी के मिलने का एसा ही सुकून होता है जैसा ताजी कविता लिखी जाने के बाद पहले श्रोता को उसे सुना दिये जाने का। चन्द्रू आज उसकी कहानी था। नारायणपुर के जंगलों से थके हारे होने की थकान कहीं नहीं दिखती थी बल्कि वह अपनी उपलब्धि के एक एक पल और वाकये से मुझे अवगत करा देना चाहता था।

केवल अपने यायावर स्वभावानुकूल उन दिनों “दण्डकारण्य समाचार” छोड कर देशबंधु से जुड गया था। देशबंधु अखबार ने ही “हाईवे चैनल” नाम के सान्ध्य अखबार का आरंभ किया था जिसके स्थानीय अंक का कार्यभार देखने के उद्देश्य से केवल उन दिनों जगदलपुर में ही था।

“मुझे आलोक पुतुल नें फोन कर के बताया कि बस्तर में किसी आदिवासी लडके पर फिल्म बनी है और उस पर स्टोरी करनी चाहिये। मुझे मालूम था कि ये असंभव सा काम है। मुझे आगे पीछे की कोई जानकारी नहीं थी। न फिल्म का नाम पता था न किसने बनाई है वो जानकारी थी।” केवल के स्वर में अपनी खोज को पूरी किये जाने का उत्साह साफ देखा जा सकता था।

“अबे ‘बस्तर एक खोज’ तू स्टोरी तक भी पहुँचेगा कि सडक ही नापता रहेगा।” मैंने स्वभाव वश उसे छेड दिया था।

“तू पहले पूरी बात सुन लिया कर।...। मैं अपना ‘क्लू’ ले कर बसंत अवस्थी जी के पास गया उन्होंने मुझे किन्ही इकबाल से मिलने के लिये कहा जो आसना में रहते हैं। उनसे इतना तो पता चला कि नारायणपुर के किसी आदिवासी पर एसी फिल्म बनी है। तुरंत ही मैनें “नारायणपुर विशेष” लिखने के नाम पर अपना टूर बनाया लेकिन दिमाग में यही कहानी चल रही थी। नारायणपुर पहुँच कर बहुत कोशिशों के बाद मुझे चन्द्रू के विषय में जानकारी मिली”

“आखिरकार तेरी सडक कहीं पहुँची तो..” मैने मुस्कुरा कर कहा। हालांकि मैं जिज्ञासु हो गया था कि यह चंद्रू कौन है? कैसा है? उसपर फिल्म क्यों बनी?

“ये अंतराष्ट्रीय फिल्म का हीरो चन्द्रू उस समय घर पर नहीं था जब मैं गढबंगाल में उसके घर पर पहुँचा। वो झाड-फूंक करने पडोस के किसी गाँव गया हुआ था” केवल नें बताया।

“कैसा था चंद्रू का घर” मैंने अनायास ही बचकाना सवाल रख दिया। मेरी उत्कंठा बढ गयी थी।

“जैसा बस्तरिया माडिया का होता है। तुझे क्या मैं शरलॉक होम्स की स्टोरी सुना रहा हूँ? वही मिट्टी का मकान, वही गोबर से लिपी जमीन, वही बाँस की बाडी।...। मुझे वहाँ बहुत देर तक उसका इंतजार करना पडा।“

“मुलाकात हुई?” यह प्रश्न जानने की जल्दबाजी के कारण मैंने किया था।

“मुलाकात!!! उसे अब न फिल्म में अपने काम की याद थी न फिल्म बनाने वालों की। उसके लिये फिल्म एक घट गयी घटना की तरह थी जिसके बाद वह लौट आया और फिर आम बस्तरिया हो गया। उसकी जीवन शैली में कोई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म का हीरो नहीं था यहाँ तक कि उसकी स्मृतियों या हावभाव में भी एसा कुछ किये जाने का दर्प या आभास नहीं था....”

“कितनी अजीब बात है न?”

“अजीब यह भी था कि उसके पास अपने किये गये काम की कोई जानकारी या तस्वीर भी नहीं थी। बहुत ढूंढ कर उसने एक किताब निकाल कर दिखाई और बताया कि इसमें उसकी फिल्म की तस्वीर है। वह इतनी बुरी हालत में थी कि उसे किताब नहीं कह सकते थे। अंग्रेजी की इस पुस्तक को मैने जानकारी मिलने की अपेक्षा में उससे माँग लिया।“

“वो क्यों देगा? उसके पास वही आखिरी निशानी रही होगी अपने काम की?”

“वही तो आश्चर्य है। उसने बडे ही सहजता से पुस्तक मुझे दे दी। मैं उसे लौटा लाने का वादा कर के उसे ले आया हूँ। किताब को अभी सिलने और बाईंड कराने के लिये दे कर आ रहा हूँ।”

केवल नें चंद्रू का एक चित्र सा खींच दिया था। मेरी कल्पना में वह “मोगली” या “टारजन”जैसा ही था। चंद्रू को सचमुच क्या मालूम होता कि उसने क्या काम किया है या कि उसने केवल को जो पुस्तक दी है खुद उसके लिये कितने मायने रखता है। जंगल से अधिक उसके लिये शायद ही कुछ मायने रखता होगा?

केवल से मैं उसकी इस कहानी के विषय में जानने की कोशिश करता रहा। उसने कहानी अलोक पुतुल को देशबंधु कार्यालय भेज दी थी। आलोक नें उस कहानी में श्रम कर तथा उसमें अपने दृष्टिकोण को भी जोड कर संवारा और फिर यह देशबंधु के अवकाश अंक में प्रकाशित भी हुआ। चंद्रू को चर्चा मिली और यह भी तय है कि अपनी इस उपलब्धि और चर्चा से भी वह नावाकिफ अपनी दुनिया में अपनी सल्फी के साथ मस्त रहा होगा। उन ही दिनों इस स्टोरी पर चर्चा के दौरान ही केवल नें मुझे बताया था कि संपादक ललित सुरजन अवकाश अंक पर इस स्टोरी के ट्रीटमेंट से खुश नहीं थे और उनकी अपेक्षा इस अनुपम कहानी के ‘और बेहतर’ प्रस्तुतिकरण की थी। यद्यपि कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। न तो केवल की और न ही चन्द्रू की।

केवल के साथ मैं धरमपुरा में दादू की दुकान पर चाय पी रहा था। केवल की आवाज में आज चन्द्रू की बात करते हुए वह उत्साह नहीं था।

“तूने चन्द्रू को किताब वापस कर दी?” मैने बात आगे बढाई।


“हाँ, मैं किताब और अखबार की रिपोर्ट के साथ नारायणपुर जा रहा था। कांकेर में कमल शुक्ला से मिलने के लिये रुक गया। वही एक और पत्रकार साथी हरीश भाई मिले। स्टोरी को पढने के बाद वो इतने भावुक हो गये कि उसे ले कर कही चले गये...जब लौटे तो उनके हाथ में एक फोटोफ्रेम था जिसमें यह खबर लगी हुई थी।“

“फिर तू चन्द्रू से मिला?”

“मैं जब गढबंगाल पहुँचा तो चन्द्रू घर पर नहीं था। घर के बाहर ही चन्द्रू की माँ मिल गयी जो अहाते को गोबर से लीपने में लगी हुई थी।“

“तूने इंतजार नहीं किया?”

“नहीं मैं देर शाम को ही पहुँचा था और मुझे लौटना भी था। जब मैने अपने आने का कारण चन्द्रू की माँ को बताया और उसे जिल्द चढी किताब के साथ फोटो फ्रेम में मढी खबर दी...”

“खुश हो गयी होगी?”

“नहीं। उसने जो सवाल किया मैं उसी को सोचता हुआ उलझा हुआ हूँ”

“तू भी पहेलियों में बात करता है”

“चन्द्रू की माँ ने कुछ देर फोटो फ्रेम को उलटा-पलटा। अपने बेटे की तसवीर को भी देखने की जैसे कोई जिज्ञासा उसमें दिखी नहीं..फिर उसने मुझसे कहा – ‘तुम लोग तो ये खबर छाप के पैसा कमा लोगे? कुछ हमको भी दोगे?”

“फिर?” मुझे एकाएक झटका सा लगा।

“पहले पहल ये शब्द मुझे अपने कान में जहर की तरह लगे। फिर मुझे इन शब्दों के अर्थ दिखने लगे। मैने शायद पचास या साठ रुपये जो मेरे पास थे उन्हे दे दिये थे और अपने साथ यही सवाल के कर लौट आया हूँ कि ‘हमको क्या मिला?’...” केवल नें गहरी सांस ली थी।

आज बहुत सालों बाद चन्द्रू फिर चर्चा में है। जी-टीवी का चन्द्रू पर बनाया गया फीचर ‘छत्तीसगढ़ के मोगली’ को राज्योत्सव में सम्मानित किया जा रहा है। मैं स्तब्ध हूँ कि चन्द्रू को खोज निकालने वाला केवलकृष्ण, उसे ढूंढ निकालने की सोच वाला आलोक पुतुल...कोई भी तो याद नहीं किया जा रहा। मैं आज फिर चन्द्रू की माँ के उसी प्रश्न को भी देख रहा हूँ जो कि पुरस्कार और उत्सव बीच निरुत्तर भटक रहा है – “हमें क्या मिला?”

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

माओवादियों का “सीजफायर” और दिनकर की “शक्ति और क्षमा” - राजीव रंजन प्रसाद

रात जब संचार माध्यमों नें चीखना आरंभ किया कि माओवादियों नें बहत्तर दिनों के सीजफायर का एलान किया है तो जिज्ञासा इस बात की थी कि उनकी शर्ते क्या हैं? हम महान देश के वासी हैं, हमसे आतंकवादी भी अपनी शर्तों पर बात करते हैं। शर्त स्पष्ट है – ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद होना चाहिये। लाल-आतंक के लम्बरदार किशन नें जब यह शर्त सार्वजनिक की तो तुरंत ही मेरा ध्यान दिनकर की प्रसिद्ध कविता “शक्ति और क्षमा” की ओर गया। कविता की एक एक पंक्ति इस घटना से भी जुडती है आईये प्रसंग और संदर्भ के साथ इसकी व्याख्या करें।

अनेकों बारूदी सुरंग विस्फ़ोट हुए, हजारों करोड की सरकारी संपत्ति स्वाहा कर दी गयी, अनेकों अपहरण, फिरौतियाँ और कत्लेआम भी जारी रहे किंतु गणतंत्र की साठवी वर्षगांठ बनाने वाले हम खामोश ही रहे। हमें पाकिस्तान की चिंता थी चूंकि उनके घर की आग में हाथ सेकते हमे मजा आ रहा था। हम रस ले कर सुनते रहे कि कैसे तालिबानी निर्ममता से हत्यायें करते हैं, कैसे बम-बंदूखों के तकिये पर सोते हैं। ठीक इसी वक्त लाल-आतंक तालिबानियों की ही रणनीति पर देश के जंगलों की आड में पनपा। उनकी हर गुस्ताखी पर हमनें कंधे झटके और अपने साहसी सैनिकों की शहादत पर कुछ घडियाली आँसुवों को बहाने के सिवा कुछ भी नहीं किया। दिनकर नें चेताया भी था कि -

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल, सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे, कहो, कहाँ कब हारा ?
क्षमाशील हो रिपु-समक्ष, तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको, कायर समझा उतना ही।

सहनशीलता एक सीमा से अधिक दुर्गुण है। लाल आतंक के डैने फैलते रहे और हम उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के दिखाये सब्ज बाग की हरी भरी सब्जियाँ खाते रहे कि एक दिन क्रांति हो जायेगी और व्यवस्था बदलेगी। सवाल यह कि जिन्हे व्यवस्था से शिकायत है वो सडक पर आयें अपने ठोस सिद्धांतों और वाद-विचार के साथ जनता के बीच जायें, उन्हे जागृत करें तथा मुख्यधारा ही उन्हे एसे बदलाव का रास्ता देती है जहाँ आपके साथ अगर जनता हो तो परिवर्तन अवश्यंभावी है। बंदूख ले कर मासूम आदिवासियों और नीरीह ग्रामीणों की हत्याओं से हिंसा फैला कर क्रांति की आशा भी बेमानी है और वास्तविकता में यह लुटेरापना है।

हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों की दुकानें “लाल” माध्यमों से चलती हैं। इस वाद के कर्ता-धर्ता इकट्ठा होने में बेहद यकीन रखते हैं। एक जैसी बात बोलेंगे, एक जैसा लिखेंगे, एक दूसरे की पीठ खुजायेंगे और केवल एक दूसरे को ही पढेंगे। यकीन नहीं होता तो आज किसी भी स्कूल में किसी भी कक्षा में जा कर समकालीन कवियों/लेखकों का नाम ले कर पूछिये उन्हें जानने वालों में किसी के हाथ शायद ही कभी उठते हैं लेकिन साहित्य के ठेकेदारों के पास जाईये तब पता चलता है कि भईया आज कल फलां-फलां समकालीन हैं। खैर फिर वही बात कि जिनकी लेखनी में इतना गूदा भी नहीं कि जन-जागृति करा सकें वे बंदूख से क्रांति के लिये अखबारों के कॉलम और टीवी के फीचर रचते हैं। देखिये हमारी सहनशीलता कि हम इन्हे बर्दाश्त भी करते हैं और नपुंसकों की तरह इनकी न समझ में आने वाली कविताओं/रचनाओं पर तालियाँ भी पीटते हैं। लाल आतंक इसी तरह की बुद्धिजीविता की आड में पनपा और हम इन्हे धिक्कारने की बजाये खामोश और सहनशील रहे। दिनकर कहते हैं -

अत्याचार सहन करने का, कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज, कोमल होकर खोता है।

मैं बस्तर की बात करूंगा। जब आदिवासी आंदोलित हुए और नक्सलवादियों के खिलाफ हथियार उठा लिया तब एक बडी क्रांति हुई। लाल-आतंक और उनके प्रचारक लेखकों को पहले तो यह समझ ही नहीं आया कि आखिर आम आदमी इस तरह अपने मामूली तीर धनुष और नंगा-चौडा सीना लिये नक्सलियों की इम्पोर्टेड बंदूखों के आगे कैसे खडा हो गया। बाद में लाल-प्रचारकों नें आम आदिमों की इस दिलेरी को सरकार-प्रायोजित बता दिया और मीडिया/पुस्तके/अखबार रंग दिये। नक्सलियों के मानव अधिकार पर ए.सी कमरों में कॉकटेल पार्टियाँ हुईं तथा लोगों को गुमराह करने का अभियान जारी रहा। इनकी फंतासी का खैर जवाब भी नहीं लेकिन यह देश इन्हे हर बार क्षमा ही करता रहा....आखिर कब तक। दिनकर कहते हैं -

क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो ।

नक्सलियों को हाथी के दाँत दिखा कर काबू में नहीं किया जा सकता था। आतंकवाद से लडने के लिये शास्त्रार्थ से काम चलेगा भी नहीं वर्ना तो बहुत सी महान समाजसेविका टाईप लेखिकायें/लेखक हैं जो इसके लिये विदेशी पैसे से बडे बडे प्रेस कॉंफ्रेंस करती है, भूख हडताल-वडताल करती/करते और करवाती/करवाते हैं। उनसे मीडिया अपने हर कार्यक्रम में बैठा कर संवाद अदायगी करवाता रहता है। खैर मीडिया के काम में बोलने वाले हम कौन? लोकतंत्र का पाँचवा खंबा है जो कि सबसे अधिक पॉलिश्ड है, यहाँ तक कि उसे भीतर लगी दीमक दिखती नहीं है।

सरकारी तंत्र हाँथ जोडे नक्सलियों के आगे पीछे दशकों से घूमता रहा कि “मान जाओ भईया-दादा” लेकिन हाल वैसा ही जैसे सागर नहीं माना था और राम तीन दिवस तक रास्ता ही माँगते रहे। रास्ता तब बताया गया जब राम नें धनुष को अपने कंधे से उतार कर संधान किया -

तीन दिवस तक पंथ मांगते, रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द, अनुनय के प्यारे-प्यारे ।
उत्तर में जब एक नाद भी, उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की, आग राम के शर से ।
सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि, करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की, बँधा मूढ़ बन्धन में।

ऑपरेशन ग्रीन हंट का नक्सलवाद समर्थक बुद्धिजीवियों/पत्रकारों/मीडिया कर्मियों और लालबुझक्कडों नें खुल कर विरोध किया, लेकिन देखिये राम नें धनुष में अभी प्रत्यंचा ही तो चढाई है, वार्ता की टेबल माओवादियों ने सजा ली है। वे जानते हैं कि जब लिट्टे नहीं रहा जब तालिबान नप गये तो इनकी भी वो सुबह आ ही जायेगी। वार्ता की पेशकश वस्तुस्थिति में ऑपरेशन ग्रीन हंट की सफलता पर मुहर है। नक्सलवाद से निर्णायक मुक्ति का समय आ गया है। वार्ता माओवादियों की शर्तों पर नहीं सरकार की शर्तों पर होनी चाहिये साथ ही नक्सल समर्थी बुद्धिजीवी सारी परिस्थिति पर पानी फेर देंगे इस लिये सीधे माओवादी और सरकार ही सीधे बात करे तब शायद किसी दिशा पर पहुँचा जा सकेगा। यहाँ भी यह सजगता आवश्यक है कि इस सीजफायर की नौटंकी का माओवादी कहीं अपनी ताकत बढानें में इस्तेमाल न करें। दिनकर नें रास्ता बताया है –

सच पूछो , तो शर में ही, बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का, जिसमें शक्ति विजय की ।
सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके, पीछे जब जगमग है।

Table Of Contents