शनिवार, 14 अगस्त 2010

ए वतन मेरे वतन, क्या करूं मैं अब जतन !

कविता / गीत

वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन

सर जमीं से आसमां तक
तुझको है मेरा नमन
वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन

भूख से, मंहगाई से
जीना हुआ दुश्वार है
वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन

क्या वतन का हाल है
भ्रष्ट हैं, भ्रष्टाचार है
वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन

मद है,मदमस्त हैं
खौफ है, दहशत भी है
वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन

भूख है गरीबी है
सेठ हैं, साहूकार हैं
वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन

अफसरों की शान है
मंत्रियों का मान है
वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन

आज गम के साए में
चल रहा मेरा वतन
वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन

वतन मेरे वतन
क्या करूं मैं अब जतन !
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स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई शुभकामनाएं

3 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

अपने मन की सच्ची बातें कह रहा है और पाठक को इस तरह उन भावों के साथ तादातम्य अनुभव करने में बड़ी सुगमता हो रही है।
जय हिन्द!

Rahul Singh ने कहा…

आपकी खुली निगाह और सतर्कता अपने आप में बड़ा जतन है.

अशोक बजाज ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आपको बहुत बहुत बधाई .कृपया हम उन कारणों को न उभरने दें जो परतंत्रता के लिए ज़िम्मेदार है . जय-हिंद

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