मंगलवार, 17 अगस्त 2010

रविवार वाला स्वतन्त्रता दिवस

परसों एक और स्वतंत्रता दिवस "निपटा" घर लौट गये सब छुट्टी मनाने, आराम करने। वही हर साल जैसा यंत्रवत माहौल था। विडंबना देखें कि इस दिन हर संस्था को एक नोटिस निकलवाना पड़ता है कि कल झंडोतोलन के समय सबका उपस्थित होना बहुत जरूरी है, उनके विरुद्ध "एक्शन लिया जाएगा जो इस दिन अनुपस्थित होंगे।

इस बार तो समस्या और भी टेढी थी क्योंकि इस बार यह पर्व रविवार के दिन पड़ा था। समय पर सब पहुंच तो रहे थे, रटे रटाए जुमले उछालते, पर देख कर साफ लग रहा था कि सब के सब बेहद मजबूरी में ही आए हैं। बहुतों से रहा भी नहीं गया और आते ही कहा 'क्या सर, एक तो संडे आता है उस दिन भी !! दसियों काम निपटाने होते हैं।

मन मार कर आए हुए लोगों का जमावड़ा, कागज का तिरंगा थामे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह घेर-घार कर संभाल रही शिक्षिकाएं, एक तरफ साल में दो-तीन बार निकलती गांधीजी की तस्वीर, नियत समय के बाद आ अपनी अहमियत जताते खास लोग। फिर मशीनी तौर पर सब कुछ जैसा होता आ रहा है वैसा ही निपटता चला जाना। झंडोत्तोलन, वंदन, वितरण, फिर दो शब्दों के लिए चार वक्ता, जिनमे से तीन ने आँग्ल भाषा का उपयोग कर उपस्थित जन-समूह को धन्य किया और लो हो गया सब का फ़र्ज पूरा। आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और प्रेरक देशभक्ति की भावना सारे लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धीरे-धीरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के या किसी और मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गया है या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय और इस बात की की आस में कि आने वाले समय में लोग खुद आगे बढ़ कर इस दिन को सम्मान देंगे, सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं।

2 टिप्‍पणियां:

'उदय' ने कहा…

... सार्थक अभिव्यक्ति !!!

डॉ. हरदीप संधु ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस के लिए लोगों की कैसी सोच है खूब अच्छे से बताया है आप ने ।
यह इतना बड़ा आडम्बर करने की क्या जरूरत है...
कोई छुट्टी भी नहीं होनी चाहिए। हर संस्था यह दिवस अपनी -अपनी संस्था में मना सकती है।
वहीं घंटा दो- घंटे का समय इस दिवस को देना चाहिए। बच्चों को स्कूल में ही इस दिन यह दिवस मनाना चाहिए ...न कि छुट्टी कर घर बैठें रहें ।
एक सोच है....एक विचार है....
मानना है या नहीं ....आप की मर्जी !!

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