रविवार, 11 जुलाई 2010

क्या सचमुच यही कालाधन है !!!

काला धन क्या है ! काला धन से सीधा-सीधा तात्पर्य ऎसे धन से है जो व्यवहारिक रूप से सरकार व आयकर विभाग की नजर से छिपा हुआ है,यह भी धन तो है पर लेखा-जोखा में नहीं है यह बडे-बडे व्यापारियों, राजनेताओं, अधिकारियों, माफ़ियाओं व हवाला कारोबारियों की मुट्ठी में अघोषित रूप से बंद पडा है, इसे न सिर्फ़ व्यवहार में सार्वजनिक रूप से लिया जा सकता है और न ही इसका सार्वजनिक रूप से उपभोग किया जाना संभव है, पर इतना तय है कि इस कालेधन से काले कारनामों को निर्भिकतापूर्वक संपादित किया जा सकता है और लुक-छिप कर इसका भरपूर उपभोग संभव है।

कालेधन का कोई पैमाना नही है यह छोटी मात्रा अथवा बडे पैमाने पर हो सकता है, दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि जिन लोगों के पास ये धन है संभवत: उन्हें खुद भी इसकी मात्रा का ठीक-ठीक अनुमान न हो, कहने का तात्पर्य ये है कि सामान्यतौर पर इंसान कालेधन का ठीक से लेखा-जोखा नहीं रख पाता है, जाहिरा तौर पर वह कालाधन जो विदेशी बैंकों मे जमा है अथवा जो विदेशी कारोबारों में लगा है उसके ही आंकडे सही-सही मिल सकते हैं, पर जिन लोगों के पास ये घर, जमीन, बैंक लाकर्स व तिजोरियों में बंद पडा है उसका अनुमान लगा पाना बेहद कठिन है।

काला धन कहां से आता है!! ... काला धन कैसे बनता है!!! ... कालेधन की माया ही अपरमपार है, बात दर-असल ये है कि धन की उत्पत्ति वो भी काले रूप में ... क्या ये संभव है! ... जी हां, ये बिलकुल सम्भव है पर इसे शाब्दिक रूप में अभिव्यक्त करना बेहद कठिन है, वो इसलिये कि जिसकी उत्पत्ति के सूत्र हमें जाहिरा तौर पर बेहद सरल दिखाई देते हैं वास्तव में उतने सरल नहीं हैं ...

... हम बोलचाल की भाषा में रिश्वत की रकम, टैक्स चोरी की रकम इत्यादि को ही कालेधन के रूप में देखते हैं और उसे ही कालाधन मान लेते हैं ... मेरा मानना है कि ये कालेधन के सुक्ष्म हिस्से हैं, वो इसलिये कि रिश्वत के रूप में दी जाने वाली रकम तथा टैक्स चोरी के लिये व्यापारियों व कारोबारियों के हाथ में आने वाली रकम ... आखिर आती कहां से है ...

... अगर आने वाली रकम "व्हाईट मनी" है तो क्या ये संभव है कि देने वाला उसका लेखा-जोखा नहीं रखेगा और लेने वाले को काला-पीला करने का सुनहरा अवसर दे देगा ... नहीं ... बिलकुल नहीं ... बात दर-असल ये है कि ये रकम भी कालेधन का ही हिस्सा होती है ... इसलिये ही तो देने वाला देकर और लेने वाला लेकर ... पलटकर एक-दूसरे का चेहरा भी नहीं देखते ...

... तो फ़िर कालेधन कि मूल उत्पत्ति कहां से है ... कालेधन की उत्पत्ति की जड हमारे भ्रष्ट सिस्टम में है ... होता ये है कि जब किसी सरकारी कार्य के संपादन के लिये १००० करोड रुपये स्वीकृत होते हैं और काम होता है मात्र १०० करोड रुपयों का ... बचने वाले ९०० करोड रुपये स्वमेव कालेधन का रूप ले लेते हैं ... क्यों, क्योंकि इन बचे हुये ९०० करोड रुपयों का कोई लेखा-जोखा नहीं रहता, पर ये रकम बंटकर विभिन्न लोगों के हाथों/जेबों में बिखर जाती है ... और फ़िर शुरु होता है इसी बिखरी रकम से लेन-देन, खरीदी-बिक्री, रिश्वत व टैक्स चोरी, मौज-मस्ती, सैर-सपाटे जैसे कारनामें ... क्या सचमुच यही कालाधन है !!!!!

2 टिप्‍पणियां:

Divya ने कहा…

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काला धन पे सुन्दर चर्चा की आपने। अफ़सोस यही है की ९० % धन जो काला धन बन जाता है , उस पर समय रहते ध्यान नहीं दिया जाता।

इस सुन्दर एवं ज्ञानवर्धन करने वाली पोस्ट के लिए आपका आभार।
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शरद कोकास ने कहा…

मार्क्स ने पूंजी की व्याख्या करते हुए विविध प्रकार की पूंजी की पेरिभाषा प्रस्तुत की है । आज के समय में पूंजी और भी नये नये रूप धारन करके समाज में आ रही है । काला धन भी उसी का एक प्रकार है ।

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