मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

आप ही बताये कि क्या यही छत्तीसगढ़ का चुनाव स्टाइल है ?

कल मैने “द हिन्दू” अखबार मे छत्तीसगढ़ से सँबन्धित एक खबर पढ़ी जिसका शीर्षक था “ Compulsory voting, Chhattisgarh style”. ये अँग्रेजी का समाचार पत्र है अत: इसका शीर्षक अँग्रेजी मे था । अगर मै उसे अनुवाद करूँ तो इसका शीर्षक होगा “अनिवार्य मतदान, छत्तीसगढी तरीका” । मै शीर्षक पढ़कर उत्साहित हुआ कि इस खबर मे अनिवार्य मतदान के किसी नायाब तरीके के बारे मे बताया गया होगा । लेकिन जब इस समाचार को पढना शुरू किया तो पता चला कि ये एक चुनाव से सम्बन्धित समाचार है जिसमे बीजापूर के एक गाँव के पँचायत-चुनाव कि कहानी है जहाँ पर गाँव के कुछ लोगो को चुनाव मे हिस्सा न लेने पर पुलिस वालो द्वारा तथाकथित पिटाई की गयी थी । इस समाचार मे ये भी नही पता नही चला कि इन गाँव वालो से जबरदस्ती वोट डलवाया गया था कि नही । लेकिन मुझे ये बात समझ मे नही आयी कि इसमे अनिवार्य मतदान वाली कौन सी बात हो गयी। और क्या छत्तीसगढ़ के एक गाँव मे घटित किसी घटना को सँदर्भ देकर उसे छत्तीसगढ़ का स्टाइल कहा जा सकता है ? क्या इसे छत्तीसगढ़ मे अनिवार्य मतदान का तरीका करके प्रचारित किया जाना चाहिए ? मै इसे प्रचारित इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि इस समाचार को आधार बनाकर आगे ये बात दोहरायी जाएगी कि छत्तीसगढ़ मे पँचायत चुनाव मे ग़ाँव वालो की मर्जी नही चलती । छत्तीसगढ़ मे तो केवल पुलिस वालो की ही चलती है और वो जिस प्रत्याशी को चाहे उसे उसके पक्ष मे मतदान करवा सकते है । और हद कि सीमा तब पार होगी जब इस समचार को उस समाचार से जोड़ा जायेगा जिसमे ये कहा जायेगा कि छत्तीसगढ़ मे तो कानून नाम कि कोइ चीज ही नही है । और इस तरह के कुतर्को की दुनिया खडी हो भी रही है जिसमे कहा जा रहा है छत्तीसगढ़ मे सँविधान नाम कि कोइ चीज नही है । और ये सब बाते प्रचारित किया जा रहा है उन लोगो के द्वारा जिन्हे छत्तीसगढ़ के बारे या तो कुछ पता ही नही है या उन्हे केवल उतनी ही बाते पता है जितना अमन सेठी ( Author of Compulsory voting, Chhattisgarh style) जैसे लोगो ने बतायी है । हमे एतराज इस बात से नही है कि आप किसी विषेश मुद्दे को जन-समुदाय तक पहूँचाना चाहते है बल्कि तकलीफ इस बात से होती है कि इस एक प्रसँग को आगे रखकर ऐसे झूठ का पुतला खडा किया जाता है जो छत्तीसगढ़ से जितना दूर होते जाता है उस पूतले कि अटटाहस उतनी ही बढ़्ती जाती है । और एक समय ऐसा आता है जब इस पुतले कि अटटाहस मे झूठ का पुलिँदा पूरी तरह ढँक जाता है ।

अमन सेठी के इस लेख को पढने से केवल यही लगेगा कि ये तो एक साधारण रिपोर्टिँग है और ये तो हर पत्रकार का कर्तब्य है कि वो समाज मे होने वाली अच्छी-बुरी बातो को सबके सामने लाये । गूगल सर्च मे अमन सेठी के बारे मे सर्च करने से ये पता चल जायेगा कि वो किस तरह के पत्रकार है । मुझे उंसके बारे मे ज्यादा जानकारी नही है लेकिन गुगल सर्च (aman sethi Chhattisgarh) से जो बात सामने आयी वो ये कि अमन सेठी जी का रूची छत्तीसगढ़ के नक्सली समस्या के बारे मे है । अमन साहब की कोइ रिपोर्ट मैने छत्तीसगढ़ के चुनाव के मामले मे नही देखी । अगर अमन सेठी साहब छत्तीसगढ़ के चुनाव कि रिपोर्टिग नही करते है तो उन्हे छत्तीसगढ़ मे होने वाले पँचायत चुनाव के बारे मे कितनी जानकारी होगी उसका अँदाजा आप लगा सकते है । और इस अल्पज्ञान के आधार पर कोइ “छत्तीसगढ़ मे अनिवार्य मतदान के तरीके” पर कोइ कितना सही बात कह सकता है उसे साधारण पाठक भी समझ सकते हैँ । हो सकता है कुछ लोगो को इसमे बुराई नजर ना आती हो लेकिन जिस तरह से अमर सेठी ने इस लेख का टाइटल दिया है उससे तो यही लगता है कि सेठी साहब कि मानसिकता केवल छत्तीसगढ़ को बदनाम करने की है । या तो ये शीर्षक इस लेख के लिए अनुपयुक्त है या ये भी हो सकता है कि अमन सेठी अपने समचार मे वजन डालने के लिए ही इस शीर्षक का उपयोग किया हो । लेकिन दोनो ही परिपेक्ष मे एक आम छत्तीसगढिया का आहत होना स्वाभाविक है । ऐसा लगता तो नही कि इतने नामी-गिरामी पत्रकार ने बिना वजह से ऐसे शीर्षक का चुनाव किया हो । तो क्या अपने लेख मे वजन डालने के लिए ही किसी को छत्तीसगढ़ के बारे मे भ्रमित जानकारी देने की स्वतँत्रता होनी चाहिए? छत्तीसगढ़ को बदनाम करने का सवाल इसलिए भी पैदा होता है क्योँकि छत्तीसगढ़ के चुनाव मे कई अभूतपुर्व चीजेँ भी हुई है , लेकिन इन अभूतपुर्व चीजोँ के बारे मे शायद अमन सेठी जैसे लोग देखना नही चाहते या फिर जानबूझकर इसके बारे मे लिखना नही चाहते ।

छत्तीसगढ़ के कई गाँव मे पँच और सरपँच निर्विरोध चुने गये है, अगर आप छत्तीसगढ से सँबन्धित समचार मे रूची रखते है तो ऐसे एक नही कई उदाहरण मिल जायेँगे जहाँ छत्तीसगढ़ के गाँवो ने आपसी सहमती से मिलकर अपने पँच और सरपँच चुन लिए । अभनपुर के पास एक गाँव के बारे मे समाचार मे ये बात पढ़ी थी और इसी तरह के कुछ समाचार अम्बिकापुर और बिलासपुर के बारे मे भी पढ़ा था । इस गाँव के बुजुर्गो ने चुनाव के नामाँकन के पहली ही सँभावित उम्मीदवारो के बीच ठीक उसी प्रक्रिया से चुनाव किया जिस तरीके से सरकारी चुनाव होते है । एक डमी चुनाव प्रक्रिया का पालन गाँव के बुजुर्गो की देख रेख मे वैसे ही सम्पन्न हुआ जैसा कि वास्तविक चुनाव मे होता है । इस चुनाव के परिणाम के आधार पर केवल उन्ही प्रतयाशियो ने नामाँकन पत्र दाखिल किया जो पहले के डमी-चुनाव मे विजयी घोषित हुए थे । इस चुनाव प्रक्रिया का अगर गहरायी से अध्ययन करे तो हमे ऐसे तथ्य मिलेँगे जिसके बारे मे हम सोच भी नही सकते । ये कैसे सँभव हुआ कि गाँव के सभी लोगो ने सहमति से बुजुर्गो की बातो पे भरोसा किया ? सामुहिक फैसला कैसे किया गया ? वो कौन सी बाते थी जो इन सामुहिक फैसलो के विरूद्ध लोगो को जाने से रोके रखा ? लोगो के दिमाग मे ये बाते क्योँ आयी कि गाँव मे निर्विरोध चुनाव होना चहिए ? इन निर्विरोध चुनाव का गाँव के सामाजिक, राजनितिक और आर्थिक स्थितियोँ पर क्या प्रभाव हुआ । इस गाँव मे इस चुनाव की प्रक्रिया जितनी शालीनता से सम्पन्न हुई इसके बारे मे अगर कोइ ईमानदारी से बात करे तो ये गाँव राष्ट्रपति पुरस्कार के अधिकारी होँगे । अभनपुर के इस गाँव के चुनाव प्रक्रिया की विधी को अगर परिष्क़ृत करके दुनिया के सामने प्रस्तुत करे तो छत्तीसगढ़ का ये छोटा सा गाँव दुनिया को लोकतँत्र का वो चेहरा दिखायेगी जिसके बारे मे दुनिया वाले सोंच भी नही सकते । इस चुनावी माडल को अगर हम केवल भारत मे लागू कर सके तो दुनिया मे भूख, भ्रष्टाचार और प्रशासन के दुरूपयोग की बाते इतिहास के पन्नो मे समाहित हो जाये । लेकिन शायद अमन सॆठी साहब जैसे लोग इस माडल की बात करना पसॅँद नही करेँगे क्योँकि अगर छत्तीसगढ़ के एक गाँव के लोकतँत्र-माडल से प्रशासन के दुरूपयोग की बाते दूर हो गयी तो शायद सेठी साहब जैसे लोगो की रोजी – रोटी छीन जाये । मैने आपसी सहमती से चुनाव वाली अधिकाँश बाते केवल इँटरनेट के माध्यम से ही पढी, और अगर आप छत्तीसगढ़ मे रहकर वहाँ के अखबार को खँगाले तो ऐसे कई उदाहरण मिल जायेँगे । मगर ऐसे समाचार पढने के लिए आपको एक सावधानी बरतनी पढेगी और वो ये कि आपको छतीसगढ़ के हिन्दी पत्रिका या समाचार-पत्र पढ़ने पढेँगे । अगर आप अँग्रेजी के समाचार-पत्र मे ये समाचार ढुँढने जायेँगे तो आपको चिराग लेके ढुँढना पडेगा और तब भी ये जरूरी नही है कि आपको इस तरह के समाचार अँग्रेजी अखबारो मे मिले ।

मैँ सीजी-नेट का सक्रिय सदस्य हूँ जहाँ से मुझे छत्तीसगढ़ के बारे मे सारी जानकरी मिलती रहती है । छत्तीसगढ़ के उपर अँग्रेजी मे छपने वाले लगभग सभी महत्वपुर्ण जानकारियाँ मुझे यहाँ से मिल जाती है । पिछले 1 महीने से छत्तीसगढ़ मे पँचायत चुनाव जोरो पर था जिसके बारे मे मुझे छत्तीसगढ़ के समाचार पत्रो से और दुसरे माध्यम से जानकारी मिलती रहती थी । पिछले महीने मैने जितनी बार फोन से बात की (घर वालो से और दोस्तो से) उनमे छतीसगढ़ के पँचायत चुनाव का जिक्र हर बार हुआ है और मेरे हिसाब से ये छत्तीसगढ़ के लिए बहुत ही महत्वपुर्ण घटना थी । लेकिन अँग्रेजी के अखबारो मे कभी इस पँचायत चुनाव के बारे मे समाचार प्रकाशित नही हुआ (कुछ हुआ भी हो तो मेरी नजर मे नही आ पायी या कोइ मेरे साथ कुतर्क करने के लिए एक – दो खबरे ले आये तो मै उन लोगो से माफी चाहूँगा) । मुझे लगा कि छत्तीसगढ़ का पँचायत चुनाव अँग्रेजी अखबारो के लिए महत्वपूर्णॅ नही है । लेकिन पुरे चुनाव होने की बाद कल मैने सीजीनेट पर ये समाचार देखा । मैने जब इस समचार का शीर्षक देखा तो मै प्रसंन्न-चित्त हो गया कि छत्तीसगढ़ के लोगो के उपर अँग्रेजी अखाबारो कि नजर पड़ी । लेकिन मै गलत था । अँग्रेजी अखाबारो कि नजर छत्तीसगढ़ पर पड़ी तो जरूर थी मगर वो गिद्ध – दृष्टी जैसी नजर थी, जिनका केवल एक ही निशाना था कि शिकार को कैसे पकड़ॆ । जिन्हे छत्तीसगढ़ मे अगर कुछ दिखायी दिया था तो वो केवल माँस का टुकडा था जिसे वो नोच-कर चबाकर अपना पेट भरना चाहता था ।

हो सकता कि मै कुछ ज्यादा ही प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूँ । मेरी श्री मति जी जो अभी इस लेख को सँपादन के दौरान पढ रही है तो उसे भी लग रहा है कि मै जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा हूँ , लेकिन दोस्तो ये बात सोचने लायक है कि अँग्रेजी अखबार को पुरे पँचायत चुनाव मे देखने को जो मिला वो केवल एक अपवाद्पूर्ण घटना थी जिसका छत्तीसगढ़ के पुरे पँचायत चुनाव से कोइ सम्बन्ध नही था और उस एक घटना को “छत्तीसगढ़ मे अनिवार्य मतदान का तरीका” बता कर दुनिया वालो के सामने परोसा जाए तब ये सवाल पैदा होता है कि ऐसी रिपोर्टिग ने दुनिया के सामने छत्तीसगढ़ का कौन सा स्वरूप प्रस्तूत किया है । और अगर मै ये कहू कि ये समाचार छत्तीसगढ़ का गलत चेहरा प्रस्तूत करता है तो क्या मैँ गलत हूँ ? क्या छत्तीसगढ़ के किसी आदमी का ऐसे गलत तरीके से प्रस्तुत किए गए समाचार पर आक्रोशित होने का हक नही है ? अगर रिपोर्टर अपनी बात कहने के लिए स्वतँत्र है तो क्या एक छत्तीसगढिया को ये कहने का हक नही है कि साहब आपकी गलत बातो से एक छत्तीसगढिया को ठेस पहूँची है ।

2 टिप्‍पणियां:

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

युवराज आपका स्वागत है .

ये एक गिरोह है महानगरों में बैठे कुछ लोगों का जो नक्सलवाद के समर्थक और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य के ही नहीं देश के दुशमन हैं

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

.... बिलकुल सही कहा ....दुस्प्रचार करने बालों का विरोध करना अत्यंत आवश्यक है.... मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं .... छत्तीसगढ के बारे मे कोई कुछ भी बोल देगा और सब सुन लेंगे ये हो नहीं सकता !!!!

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