रविवार, 21 फ़रवरी 2010

आमचो बस्तर किमचो सुन्दर था [कविता] - राजीव रंजन प्रसाद



मेरा बस्तर, जहाँ अक्सर, घने जंगल में मैं जा कर
किसी तेंदू की छां पा कर, इमलियाँ बीन कर ला कर
नमक उनमें लगा, कच्चा हरा खा कर
दाँतों को किये खट्टा, खुली साँसे लिया करता, बढा हूँ
मैं बचपन से जवानी तक यहीं पला हूँ, पढा हूँ..
मुझे “मांदर” बजाना जब, सुकारू नें सिखाया था
वो एक सप्ताह था, गरदन घुमा भी मैं न पाया था
वो दिन थे जब कि जंगल में, हवा ताजी, उजाले थे
”आमचो बस्तर किमचो सुन्दर, किमचो भोले भले रे”

मगर मुझसे किताबों ने मेरा बस्तर छुडाया है
मुझे अहसास है लेकिन, वो ऋण ही मेरी काया है
मुझे महुवे टपकते नें ही तो न्यूटन बनाया था
मुझे झरते हुए झरने नें कविता भी लिखाई थी
”बोदी” के जूडे में फसी कंघी ही फैशन था
वो कदमों का गजब एका, वो नाचा जब भी था देखा
मेरे अधनंगे यारों की गजब महफिल थी
तूमड में छलकती ताडी में भी जीवन था
बहुत से नौकरी वालों को धरती काला पानी थी
कोई आदिम के तीरों से, किसी को शेर से डर था
मेरा लेकिन यहीं घर था...

मैं अब हूँ दूर जंगल से, बहुत वह दौर भी बदला
मेरे साथी वो दंडक वन के, कुछ टीचर तो कुछ बाबू
मुझे मिलते हैं, जब जाता हूँ, बेहद गर्मजोशी से..
वो यादें याद आती हैं, वो बैठक फिर सताती है
मगर जंगल न जानें की हिदायत दे दी जाती है
यहाँ अब शेर भालू कम हैं, बताया मुझको जाता है
कि भीतर हैं तमंचे, गोलियाँ, बम हैं, डराया मुझको जाता है
तुम्हारा दोस्त “सुकारू” पुलिस में हो गया था
मगर अब याद ज़िन्दा है...

एक भीड है, जो खुद को नक्सलवादी कहती है
घने जंगल में अब यही बरबादी रहती है
हमें ही मार कर हमको ये किसका हक दिलायेंगे
ये मकसदहीन डाकू हैं, हमारा गोश्त खायेंगे
ये लेबल क्रांतिकारी का लगा कर दुबके फिरते हैं
ये वो चूहें हैं, जिनने खाल शेरों की पहन ली है
मगर कौव्वे नहा कर हंस बन जायें, नहीं संभव
हमें जो चाह है उस स्वप्न को हम शांति कहते हैं
लफंगे हैं वो, कत्ल-ए-आम को जो क्रांति कहते हैं..

वो झरना दूर से देखो, न जाना अबकि जंगल में
न फँस जाओ अमंगल में
तुम अपने ही ठिकाने से हुए बेदख्ल हो
तुम्हारे घर में उन दो-मुहे दगाबाजों का कब्जा है
तुम्हारे जो हितैषी बन, तुम्हारी पीठ पर खंजर चलाते हैं
"आमचो बस्तर, किमचो सुन्दर था",
लहू से बेगुनाहों के लाल लाल है
झंडा उठाने वाले जलीलों,
तुम्हारी दलीलें भी बाकमाल हैं
तुम्हारे इन पटाखों से कोई सिस्टम बदलता है?
घने बादल के पीछे से, नहीं सूरज निकलता है
अरे बिल से निकल आओ, अपनी बातों को अक्स दो
हमें फिर जीनें दो, जाओ, हमें बक्श दो...

3 टिप्‍पणियां:

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

"हमें ही मार कर हमको ये किसका हक दिलायेंगे
ये मकसदहीन डाकू हैं, हमारा गोश्त खायेंगे"

बिल्कुल सही विवेचना की है , अगर या क्रांतिकारी हैं तो जंगल में निरीहों को क्यों मार रहे हैं दम है तो शहर में आकर भ्रष्टाचार खतम करें . चूहे हैं ...

nitesh ने कहा…

एक भीड है, जो खुद को नक्सलवादी कहती है
घने जंगल में अब यही बरबादी रहती है
हमें ही मार कर हमको ये किसका हक दिलायेंगे
ये मकसदहीन डाकू हैं, हमारा गोश्त खायेंगे
ये लेबल क्रांतिकारी का लगा कर दुबके फिरते हैं
ये वो चूहें हैं, जिनने खाल शेरों की पहन ली है
मगर कौव्वे नहा कर हंस बन जायें, नहीं संभव
हमें जो चाह है उस स्वप्न को हम शांति कहते हैं
लफंगे हैं वो, कत्ल-ए-आम को जो क्रांति कहते हैं..

सार है नक्सलवाद नें नाम पर हो रही नृशंसता का।

श्याम कोरी 'उदय' ने कहा…

यहाँ अब शेर भालू कम हैं, बताया मुझको जाता है
कि भीतर हैं तमंचे, गोलियाँ, बम हैं, डराया मुझको जाता है
....प्रभावशाली रचना,बधाई !!!

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